सोमवार, 28 जुलाई 2008

हम कितने भोले हैं

21 और 22 जुलाय को संसद में हुई बहस में विश्वास मत के समर्थन में भाषण देने वालों में राहुल गांधी का भी नाम था। राहुल बोले जम कर बोले। खूब शब्दों का जाल बुना। आत्मविश्वास की बात की। भारत के लिए और युवाओं के लिए सपने बुने। ऱाजनीतिक दलों के खाचो से बाहर निकलने का सुझाव दिया। परन्तु भोलेभाले राहुल बाबा यह बताना ही भूल गए कि आगे बढ़ने के लिए पांव रखने के लिए जो ठोस जमीन चाहिये वह कहां से आएगी।जिस जमीन पर चल कर युवा भारत को आगे बढ़ना है यदि वह जमीन ही पोली हुई तो कैसे भारत के नौनिहाल आगे बढेंगे। पोली जमीन पर चलना कितना दूभर होता है इसका हमें दो सौ सालों का अनुभव है।स्मरणीय है कि आम भारतीय ने खुशी से अंगेजों की गुलामी नही स्वीकारी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले और बाद आदिवासियों ने पुरजोर ताकत से ब्रितानी सत्ता का विरोध किया। परन्तु वे ऐसे कुचले गए कि आज तक भी नही उबर पाए। आज फिर उदारीकरण की आंधी में उनका सब कुछ तहस नहस होरहा है। और वे अपने जंगल जमीन बचाने के लिए एक बार फिर अपना सब कुछ दाव पर लगाने मजबूर हैं।राहुल गांधी जब युवाओं को सपने दिखा रहे हैं तो एक सेकिन्ड के लिए लगा कि दलित, आदिवासी, आत्महत्या करने को मजबूर गरीब किसान, मजदूर, बुनकर अन्य शिल्पकार, रेहणी पटरी वाले युवक शायद उनके जहन में नही होंगे। पर ऐसा नही था। राहुल गांधी ने ऋण के बोझ तले दबे आत्महत्या करने को मजबूर हुए किसान की बेवा कलावती का जिक्र किया और कहा कि इस करार से उस जैसी गरीब महिला को बिजली मिलेगी। इससे अधिक भद्दा मजाक क्या हो सकता है। बहस के एक दो दिन बाद एक समाचार चैनल वालों ने कलावती को खोज निकाला। कलावती ने चैनल के संवाददाता को बताया कि उसके घर में दो दिन से पकाने को चावल नही थे।जिसके पास चावल खरीदने को पैसा नहीं हो वह परमाणु ऊर्जा से बनी बिजली कैसे खरीद सकती है?यह प्रश्न हमारे जनप्रतिनिधियों के लिए प्रासंगिक नही था। राहुल गांधी को भी इसको समझाने की जरुरत नही थी। लाख टके के इस सवाल का जबाब महात्मा गांधी ने खादी और कुटीर उद्योगों में ढ़ूढ़ा। राहुल विदेशी पूंजी और तकनीक आधारित परमाणु ऊर्जा उद्योग में ढ़ूढ़ रहे हैं।
क्या राहुल गांधी अज्ञानवश यह कह रहे थे या परमाणु करार के अन्य समर्थकों की तरह दोगला बोल रहे थे।प्रासंगिक है दोगला बोलना आधुनिक सभ्यता की विशेषता है। दो सौ साल की गुलामी के दौरान अंग्रेज इस दोगलेपन को हमारे खून में घोल गए हैं। इसीलिए लगभग सारे नेता गरीबो, किसानों को बिजली देने के नाम पर नाभिकीय करार का समर्थन कर रहे थे। जबकि गरीब तबकों को लोग इतना महंगी बिजली खरीदने की हैसियत ही नही रखते। पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों ने दो तिहाई दुनियां का शोषण कर खुशहाली का वर्तमान स्तर हासिल किया। और इन दो तिहाई लोगों को गुलाम बनाने की प्रक्रिया को सभ्य बनाने का मिशन बताया तथा सफेद आदमी का बोझ कहा। इससे बड़ा झूठ और क्य़ा होसकता है। आज भी इस दो तिहाई विश्व को शोषण दमन की जो नीतियां बन रही हैं उनको इन देशों की गरीबी दूर करने को लिए आवश्यक बताया जाता है।1833 में लार्ड मेकाले ने भारत में दोगली संस्थाओं के स्थापना का मार्ग प्रसस्त किया। यह भारत में अंग्रेजी शिक्षा लागू करने के बहाने किया गया।का कानून पारित करवाया। इसी के साथ भारत में अंग्रेजी शासनिक एवं प्रशासनिक संस्थाओं की नींव पड़ी। अंग्रेजी शिक्षा कानून पारित होने से पहले रिफोर्म विधेयक पर बहस पर बोलते हुए लार्ड मेकाले ने कहा कि, “ भविष्य में शायद वे(भारतीय )पूर्ण यूरोपीय शासन-प्रणाली जारी कराना चाहेंगे.... जिस दिन सचमुच भारत में ऐसी अवस्था उपस्थित होगी , इंग्लेंड के इतिहास में वही दिन सबसे बढ़कर गौरव-जनक समझा जायगा। वस्तुतः हम इस गौरव के पूर्ण अधिकारी होंगे।”( सखाराम गणेश देउस्कर देश की बात, एल बी टी.2005 पृष्ट6-7)

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