गुरुवार, 24 जुलाई 2008

हम कितने भोले हैं

भारत अमेरिका परमाणु करार बहस में करार समर्थकों ने शब्दों का जो मायाजाल रचा, जिस तरह से ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअन्दाज कर यह समझाने की कोशिश की कि यह समझौता भारत के हित में है। उससे तो यही लगा कि करार समर्थक बहुत भोले हैं या बन रहे हैं।चूंकि करार समर्थक मानते हैं कि यह एक ऐतिहासिक मौका भारत के हाथ लगा है। भारत को इस मौके को नही गवाना चाहिये यदि अभी गवा दिया तो फिर शायद कभी हाथ नही आएगा और भारत अमेरिका से दोस्ती करने का मौका हाथ से गवा देगा। दुर्भाग्य से ऐतिहासिक तथ्य कुछ और ही कहते हैं इस ब्लाग में इन्ही तथ्यों के आधार पर यह दर्शाने की कोशिश की जाएगी कि किसी भी साम्राज्यवादी देश का पिछलग्गू होना कितना बड़ा अभिशाप है। अमेरिका से दोस्ती का एक नमूना तो हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान है। उसकी हालत तो जग जाहिर है।फिर भी यदि हम अमेरिका से दोस्ती कर तथाकथित विकास करने का सपना देख रहे हैं तो क्या हम भोले नहीं हैं?अभी इतना ही । आगे और तथ्य आपके सामने रखेंगे।

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