एक नव विवाहित पति पत्नी में झगड़ा हुआ। बात बढ़ते बढ़ते मारपीट की नौबत आगई। पति ने पत्नी को इतना पीटा की पुलिस में रपट लिखानी पड़ी। थाने में एस एच ओ पत्नी को बूरी तरह पिटी देख कर द्रवित होगया।उसकी टिप्पणी थी कि इतनी पढ़ी लिखी और इतनी सुंदर लड़की का यदि यह हाल है तो हमारी बेटियों का क्या होगा? फिर उसको लगा कि इतना पढ़ लिख कर विशेषज्ञ बन कर भी यदि लड़कियों को इस प्रकार पिटना पड़े तो उन्हें पढ़ाने से क्या फायदा ?
कितना बड़ा विरोधाभाष है
चोरी होने के डर से हम धन संपत्ति जोड़ना नही छोड़ते। वरन् उस संपत्ति की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करते हैं। घर में हर तरह के ताले, ग्रिल आदि आदि, बैंक में लाकर। बेटे की चाह भी घर का दरवाजा खुले रखने के एजंट की भूमिका में अधिक स्वर्ग पहुचाने की भूमिका में कम होती है।
व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए पुरुष अपना शारीरिक बल बढाते हैं।लेकिन जब नारी की बात आती है तो उसको बचपन से ही तमाम प्रकार की खतरों, व असुरक्षाओं का न तो ज्ञान करया जाता है और न ही उनसे जूझने के लिए सक्षम बनाया जाता है। नारी को ताउम्र होने वाले खतरों के बावजूद समाज में अधिकतर माता पिता सर्वगुण संपंन, सुंदर, सुकोमल,(सूरज अस्पर्शया), भोली भाली, आज्ञाकारी पुत्री, और पति ऐसी ही पत्नी की पाने की कामना करते हैं। लड़की आत्मनिर्भर बने या न बने उसको एक कुशल ग्रहणी बनाना हर मां अपना परम करतब्य समझती है।लड़की को आत्मनिर्भर बनाना या उसमें अपने बारे में स्वयं निर्णय लेने का आत्मविश्वास जगाना,या उसका सुविधा संपंन होना उसके सफल ग्रहस्थ जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है। इसीलिए माता पिता दान दहेज तो खूब देते हैं पर बेटे के बराबर का हिस्सा देने में आनाकानी करते हैं।
बेचारी अबला नारी के सांचे में ही हमारा समाज औरत को ढ़ालना चाहता है।बचपन की अपेक्षित बाल क्रीड़ाएं भी बेटा और बेटी की भिनं होती हैं। बेटे की हर प्रकार की शैतानियां, उद्दडंताए माता पिता के लिए आनंदित होने का सबब बनती हैं। पर बेटी से तो आज्ञाकारिता, सेवा भाव ही अपेक्षित होता है। आज्ञाकारिता, और सेवा भाव के सांचे में ढ़ली बेटी पितृसत्ता के दोहरे मापदंडों से सारा जीवन कैसे लोहा लेगी यह आम तौर पर माता पिता की चिंता नहीं होती। आम जिंदगी में तो अधिकतर माता पिता भी पितृसत्ता के पोषक ही होते हैं। पितृसत्ता उन्हें तभी परेशान करती है जब बेटी के सांथ कुछ अनहोनी होजाय।बेटी को न्याय भी वे पितृसत्ता के मापदंडों के तहत ही चाहते हैं—वह अपने पति के घर में रहे और माता पिता उसके सुखी होने का दम भरते रहें।
सोमवार, 25 मई 2009
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